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कड़हलबिल में गुरुमाता लुखी देवी करातीं हैं सनातन रीति-रिवाज से दुर्गापूजा अनुष्ठान

नवमी को प्रमंडल के सभी छह जिलों से साफा होड़ समुदाय के लोगों का होगा जुटान, खिचड़ी महाभोग में करेंगे शिरकत

षष्ठी से दसवीं तक गुरुमाता व इनके शिष्य नहीं करते हैं अन्न ग्रहण

प्रतिमा विसर्जन के बाद ही करते हैं अन्न का ग्रहण

दुमका (झारखण्ड) : दुमका के शिवपहाड़ के निकट है कड़हलबिल। यहीं आवासीय अनुसूचित जनजाति बालिका उच्च विद्यालय परिसर से सटे साफा होड़ समुदाय के लोग वर्ष 1979 से पारंपरिक सनातन रीति-रिवाज से वैष्णवी दुर्गा पूजा अनुष्ठान करते हैं। खास बात यह कि यहां बिल्कुल सादगी, अनुशासित और आडंबर रहित तरीके से मां दुर्गा की पूजा होती है। पूजा का आयोजन साफा होड़ संस्कृति समिति की ओर से किया जाता है। कड़हलबिल में दुर्गा पूजा की शुरुआत साफा होड़ समुदाय के गुरु सोभान टुडू ने की थी। वर्ष 2003 में उनके निधन के बाद उनकी धर्मपत्नी लुखी देवी मुर्मू बतौर गुरु माता पूरा कार्य जिम्मेवारी संभाल रही हैं। वर्ष 2004 से लुखी देवी मुर्मू बतौर मुख्य पुजारी दुर्गा पूजा अनुष्ठान को कराती हैं। अनुष्ठान के दौरान बतौर शिष्य बालीडीह के मंगल मरांडी, अमड़ापाड़ा के बरसन मुर्मू, पाकुड़िया के मेहीलाल हांसदा, पोडैयहाट के पगान मुर्मू एवं हंसडीहा के चुन्नू मुर्मू इनका साथ देते हैं। ये सभी शिष्य दुमका पहुंच गए हैं और पूजा अनुष्ठान की तैयारियां में लगे हैं।

आज होगी कलश स्थापना

षष्ठी तक यहां के मंदिर में माता दुर्गा की पिंड की पूजा एक कलश स्थापित कर किया जाता है। गुरुमाता लुखी देवी मुर्मू रोजाना कलश का जल बदलकर विधि-विधान से पूजा करती हैं। सप्तमी को पांच कलश में तालाब से जल लाकर कलश स्थापित करने का विधान है। प्रतिमा भी सप्तमी को स्थापित की जाती है। कलश स्थापना के दौरान समुदाय के लोग परंपरागत वेशभूषा में ढोल-ढाक के साथ तालाब पहुंचते हैं और वहां से कलश में जल भर कर मंदिर लौटते हैं। इससे पूर्व पष्ठी से ही गुरु माता और इनके शिष्य जो पूजा अनुष्ठान में शामिल होते हैं वह अन्न का ग्रहण नहीं करते हैं। पांच दिनों तक फलाहार पर रहते हैं और दसवीं को प्रतिमा विसर्जन के उपरांत ही अन्न का ग्रहण करते हैं। इस दौरान गुरुमाता लखी देवी मुर्मू प्रतिदिन तीन घंटे चंडी पाठ करती हैं। दुर्गा समेत अन्य देव-देवताओं का आह्वान पूरे विधि-विधान से किया जाता है। प्रसाद के तौर पर फल, लड्डू चढ़ाए जाते हैं।

नवमी को बड़ी संख्या में साफा होड़ समुदाय का होता है जुटान

यहां नवमी के दिन संताल परगना के गोड्डा, पाकुड़, साहिबगंज समेत विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में साफा-होड़ समुदाय के लोग पहुंचेंगे और पूजा-अनुष्ठान में पूरे अनुशासित भाव से शामिल होंगे। इस माता को बतौर प्रसाद खिचड़ी भाेग लगाने की परंपरा है। यही खिचड़ी विभिन्न हिस्सों से आए साफा होड़ समुदाय के लोग बतौर प्रसाद ग्रहण करते हैं। इस दिन मां को प्रसन्न करने के लिए भजन-कीर्तन भी पारंपरिक अंदाज में किया जाता है। फिलहाल, यहां के पूजन अनुष्ठान की तैयारियों में पाकुड़ से आए स्टेफन मरांडी, अमड़ापहाड़ी के सोम मरांडी, बाबूलाल मुर्मू, नागेश्वर मुर्मू, चुन्नू मुर्मू समेत कई पूरी निष्ठा से जुटे हैं। पूछने पर इनलोगों ने कहा कि दुर्गापूजा में वे लोग प्रत्येक साल यहां आते हैं।

अपने धर्म व संस्कृति को बचाने के लिए सबको तत्पर रहना चाहिए। समाज के लिए अच्छी भावना रखनी चाहिए। लोभ, लालच में पड़ने से समाज को हानि होती है। मां दुर्गा से यही अरज करते हैं कि सनातन धर्म व संस्कृति की गरिमा सदैव अक्षुण्ण बनी रहे।         लुखी देवी मुर्मू, गुरुमाता, साफा होड़ समुदाय।

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