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कैलाश मानसरोवर की यात्रा में हुई अध्यात्म की अनुभूति : मनीषा कुलश्रेष्ठ

रांची के बीएनआर चाणक्य में वार्ता कार्यक्रम किया गया था आयोजित

रांची (झारखण्ड) : प्रतिष्ठित लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ कहती हैं कि कैलाश मानसरोवर की यात्रा के दौरान उन्हें अध्यात्म की अनुभूति हुई, जो उनकी स्मृतियों में बस गई है। वूमेन आफ इंडिया, रांची के संयुक्त तत्वावधान में साहित्यप्रेमियों के लिए आयोजित ”कलम : अपनी भाषा अपने लोग” कार्यक्रम में लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ विशेष अतिथि के तौर पर मौजूद थीं। सोमवार की शाम को बीएनआर चाणक्य में आयोजित वार्ता कार्यक्रम के दौरान मनीषा कुलश्रेष्ठ ने उनकी कैलाश मानसरोवर की यात्रा वृतांत पर चर्चा पर कहा कि अगर कालीदास का मेघदूत नहीं पढ़ती, तो कैलाश की यात्रा पर कभी नहीं निकलती। मनीषा ने कहा कि जब वे वहां पहुंचीं, तो ऐसा लगा कि कैलाश अपनी दो आंखों को तिरछी कर देख रहा है। वह दृश्य काफी अलौलिक था। हालांकि यह कोई धार्मिक या आध्यत्मिक यात्रा नहीं थी। लेकिन मुझे कैलाश की वजह से अध्यात्म की अनुभूति हुई। वहां जाकर ऐसा अहसास हुआ कि यह कोई आंतरिक यात्रा है।

कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुए शिक्षिका सह लेखिका मुक्ति शाहदेव ने मनीषा कुलश्रेष्ठ के हर पहलू को वहां उपस्थित लोगों से रू-ब-रू कराया। मुक्ति द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में मनीषा ने कहा कि उनके सभी उपन्यासों में स्त्री मूल तत्व में नहीं है। ”शिगाफ” उपन्यास का केंद्र कश्मीर समस्या थी। कहा कि उपन्यास लेखन शोध मांगता है, वहीं मेरे स्वभाव में विविधता भी है। ”शिगाफ” में सिजोफ्रेनिया का जिक्र भी है, तो इसे जानने की उत्सकुता भी हुई कि आखिर सिजोफ्रेनिया में कैसे लोग अवास्तविक चीजों को देख लेते हैं। उपन्यास लिखने के पहले इस विषय पर काफी शोध किया।

वहीं, अपनी एक अन्य उपन्यास ”मल्लिका” के विषय में उन्होंने कहा कि कथादेश में मल्लिका के कुछ अंश प्रकाशित हुई थी। जब बंगाल में रहने गई, तो वहां 24 परगना में जहां मल्लिका रहती थीं। उनके बचपन को जानने के लिए वहां गई। बनारस में उनका भारतेंदु हरिशचंद्र से साक्षात्कर होना। भारतेंदु और मल्लिका के बीच जो साहित्यिक प्रेम था, वह शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। लॉकडाउन के दौरान रचित उपन्यास ”सोफिया” के जिक्र पर मनीषा ने कहा कि उनका यह उपन्यास ऑनर किलिंग पर नहीं है, जैसा कि लोग समझते हैं। सोफिया एक असली चरित्र है। मैं असली नाम नहीं बताउंगी। उसने मुझे बचपन में गोद में खिलाया था। कुछ सच्चाई और कुछ काल्पनिक बातों का सहारा लेकर इस उपन्यास को लिखा। सोफिया एक ऐसी प्रेम कथा है, जो समाज के असहिष्णु चेहरे को सामने लाता है। सोफिया से मुलाकातों के अनुभवों के आधार पर यह कथा जन्मी है।

मुक्ति द्वारा पूछे गए आजकल हिंदी की बेस्टसेलर किताबों में जिस प्रकार की अशालीन भाषा का प्रयोग होता है, के सवाल पर उन्होंने बेहद सहज एवं सरल शब्दों में कहा कि कहा कि हम सभी की अपनी-अपनी पसंद होती है। जिस प्रकार हमारा कोई पसंदीदा व्यंजन होता है। उसी प्रकार जिसको जो स्वाद लग जाता है, वही पढ़ना चाहता है। युवा पीढ़ी का रुझान हिंदी में नहीं होने के सवाल का जवाब देते हुए कहा कि हमें अपने बच्चों पर कुछ भी थोपना नहीं चाहिए, जिसे जरूरत होगी, वह जरूर आएगा। रही बात हिंदी के भविष्य का सवाल है, तो सूचना प्रौद्योगिकी ने हिंदी के छूट चुके पाठकों को जोड़ा है। आज हमें अमेजन व ई-पुस्तकालय में कई ऐसे लेखकों की रचनाएं सहज उपलब्ध हैं, जो कभी खोजने पर नहीं मिलते थे। कार्यक्रम का संचालन पूनम आनंद ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन सीमा जी ने किया। कार्यक्रम में कई लेखक व साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।

अब तक सात कहानी संग्रह व पांच उपन्यास प्रकाशित

विज्ञान स्नातक, हिंदी साहित्य से स्नात्कोत्तर, एमफिल व कथक विशारद मनीषा कुलश्रेष्ठ की अब तक सात कहानी संग्रह कठपुतलियां, कुछ भी तो रूमानी नहीं, केयर आफ स्वातघाटी, गंधर्वगाथा, बौनी होती परछाई, अनामा और रंगरूप-रसगंध के अलावा पांच उपन्यास शिगाफ, शाल भंजिका, पंचकन्या, स्वप्नपाश और मल्लिका प्रकाशित हो चुकी है। लेखिका की वैचारिकी एवं यात्रा वृतांत सहित कई अनुवाद पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। मनीषा कुलश्रेष्ठ को रांगेय राघव पुरस्कार, केके बिड़ला फाउंडेशन के बिहारी सम्मान, चंद्रदेव शर्मा सम्मान सहित कई साहित्यिक पुरस्कारों एवं फेलोशिप से सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने विदेशों में साहित्य चर्चा और जोहांसबर्ग में नौवें विश्व हिंदी सम्मेलन में भी हिस्सा लिया है।

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