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जिंदगी व मौत से जूझ रहे एक और जवान की ब्रेन मलेरिया ने ले ली जान

– झारखंड के जंगल में तैनात 13 सालों में एसटीएफ के 63 जवानों की ब्रेन मलेरिया व सर्पदंश से गयी जान
– जंगलों में रहते हैं तैनात, सुविधा के नाम पर नहीं है कोई व्यवस्था

रांची (झारखंड) : नक्सलियों के खिलाफ अभियान में वर्ष 2008 से अब तक जंगलों में झारखंड जगुआर (जेजे या एसटीएफ) के असाल्ट ग्रुप में तैनात 63 जवानों की सांप, बीमारी व जंगली जानवरों ने जान ले ली है। गुरुवार को भी एक झारखंड जगुआर का एक जवान उपेंद्र कुमार ब्रेन मलेरिया की भेंट चढ़ गया। वह पश्चिमी सिंहभूम के मलेरिया प्रभावित आरापीड़ी में तैनात था और बीमार होने के बाद 10 दिन पहले ब्रेन मलेरिया की पुष्टि के बाद अग्रवाल नर्सिंग होम में भर्ती हुआ था। तीन दिन पहले ही उसे मेडिका अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां गुरुवार की सुबह उसकी मौत हो गई। झारखंड जगुआर का जवान उपेंद्र कुमार मूल रूप से पलामू के लेस्लीगंज थाना क्षेत्र के गुरुआ पोस्ट स्थित ओरिया का रहने वाला था। 18 जुलाई 1997 को जन्मे उपेंद्र ने छह जून, 2017 को झारखंड जगुआर में सिपाही के पद पर नौकरी शुरू की थी।

बीमारी से मौत के बाद उसके शव को रातू के टेंडरग्राम स्थित झारखंड जगुआर कैंप में ले जाया गया, जहां आइजी अभियान अमोल वी. होमकर, डीआइजी अनूप बिरथरे, एसपी शैलेंद्र कुमार वर्णवाल, एसपी संजय किस्पोट्टा व कर्नल जेके सिंह सहित साथी जवानों-पदाधिकारियों ने पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। मौके पर जवान उपेंद्र कुमार के पिता दीप नारायण महतो, मां व छोटा भाई मौजूद थे।

बीमारी से मौत पर न शहीद का दर्जा, न सुविधाएं, 13 माह का वेतन भी नहीं
झारखंड पुलिस में बीमारी से मौत के मामले में शहीद का दर्जा नहीं मिलता है। नक्सल अभियान से संबंधित कोई भी विशेष भत्ता नहीं मिलता है। सिर्फ अनुकंपा पर नौकरी व साधारण जमा-पूंजी ही परिजन को मिलता है। जबकि, नक्सलियों से मुठभेड़ में शहीद होने पर अनुकंपा पर नौकरी, शेष सर्विस के वेतन की एकमुश्त राशि के अलावा अन्य कई सुविधाएं शहीद के आश्रित को मिलती है। झारखंड जगुआर में 13 माह के वेतन का भी प्रावधान नहीं है.

2008 की टूटी-फूटी गाड़ियां ही इस्तेमाल करते हैं नक्सल विरोधी अभियान में शामिल जवान-पदाधिकारी

झारखंड जगुआर की स्थापना 2008 में हुई थी। इस बल को बनाने के पीछे यही उद्देश्य था कि यहां तैनात जवानों को नक्सलियों के विरुद्ध लड़ना है। इसके लिए कई असाल्ट ग्रुप भी बनाकर उसमें जवानों को तैनात किया गया। झारखंड जगुआर को जो गाड़ियां मिलीं थीं, वह 2008 में मिली थीं। आज भी अभियान में शामिल जवान टूटी-फूटी गाड़ियों में चलते हैं। अभियान से लौटने के बाद ये जवान टेंट में रहते हैं। इन्हें पीने की पानी की समस्या तो है ही, कैंप तक जाने के लिए सड़क तक नहीं है। अब तक इस बल के 83 जवानों की मौत हो चुकी है, जिसमें 20 जवान नक्सलियों से मुठभेड़ में शहीद हुए और 63 जवान बीमारी तथा सांप तथा जानवर के काटने से मर गए।

सरकार ऐसे जवानों की मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करे : एसोसिएशन

झारखंड पुलिस मेंस एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष राकेश कुमार पांडेय ने कहा कि झारखंड जगुआर के जवान दिन-रात जान हथेली पर रखकर ड्यूटी करते हैं। नक्सलियों के साथ-साथ इन्हें जंगली जानवरों, सांप व मच्छरों से भी दो-चार होना पड़ता है। इन्हें बीमारी से मौत पर भी शहीद का दर्जा मिले, इन्हें भी 13 माह का वेतन मिले, इन्हें भी उग्रवादी भत्ता मिले, इससे संबंधित पत्राचार एसोसिएशन कई बार पुलिस मुख्यालय व राज्य सरकार से कर चुका है, लेकिन अब तक विचार नहीं हो सका। राज्य सरकार को इसपर सहानुभूतिपूर्वक विचार करना चाहिए।

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