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दुर्गापूजा की अष्टमी-नवमी तिथि चंद दिनों दूर, चाट-फुचका वालों का सपना चकनाचूर

इस दुर्गापूजा में भी मेला पर पाबंदी, ठेला-खोमचा वाले हताश

रांची (झारखण्ड) : शारदीय नवरात्र आरंभ हो गया है। शनिवार को नवरात्र का तीसरा दिन है. पंडालों का निर्माण अंतिम दौर में है। अष्टमी-नवमी तिथि अब चंद दिनों दूर हैं। लोग फेस्टिव मूड में आ गए हैं, लेकिन कोरोना वायरस की संभावित तीसरी लहर को देखते हुए राज्य सरकार ने इस वर्ष भी दुर्गापूजा में पंडालों के आसपास मेला नहीं लगाने का आदेश लागू कर दिया है। पूजा का आयोजन सिर्फ परंपरा का निर्वहन करने के लिए ही हो रहा है। लिहाजा, इस पूजा में भी खास रौनक की उम्मीद नहीं है। इस वजह से पूजा में मेले के दौरान दुकान लगाने वाले चाट-फुचका के दुकानदारों का सपना इस बार भी चकनाचूर हो गया है। लगातार दो वर्षों से पूजा पंडालों के पास मेला नहीं लगने के कारण राजधानी रांची में हर वर्ष मेला लगाने वाले ठेला-खोमचा लगाने वालों के सामने संकट खड़ा हो गया है, क्योंकि पूजा के दौरान चार-पांच दिनों में मेला में ठेला लगाने से उनकी जो कमाई हो जाती थी, उतनी कमाई तो महीने भर हाड़तोड़ मेहनत करने के बावजूद नहीं हो पाती है। सरकारी गाइडलाइन लागू होने के कारण इन्हें एक बार फिर से मायूसी हाथ लगी है।

कोरोना काल के पहले राजधानी रांची में दुर्गा पूजा के दौरान कोकर, रातू रोड, रेलवे स्टेशन, हरमू रोड, सेवा सदन के सामने, अपर बाजार, बकरी बाजार सहित सैकड़ों स्थान पर पंडालों के निकट मेले का आयोजन किया जाता था। लेकिन वर्ष 2020 में कोराेना की प्रथम लहर और इस साल दूसरी लहर में जिस प्रकार इस वैश्विक महामारी ने अपना रूप दिखाया, उसे देखते हुए राज्य सरकार द्वारा लगातार दो वर्षेां से न सिर्फ थीम आधारित पूजा पंडाल और प्रतिमाओं के आकार पर पाबंदी लगाते आ रही है, बल्कि पंडालों के आसपास लगने वाले मेले पर भी रोक लगा दी गई है। इन मेलों में गोलगप्पा, भेलपुरी, चाइनीज, फास्ट फूड आदि खाद्य सामग्रियों की दुकान के साथ-साथ छोटे बच्चों के लिए खिलौने की दुकान एवं  झूले भी लगाए जाते थे। मेले से सैकड़ों छोटे स्ट्रीट वेंडर्स का रोजगार टिका होता था। सप्तमी से दशमी के दौरान ठेले और खोमचेवाले 15 से 20 हजार रुपये की कमाई कर लेते थे। इस वर्ग को इस दुर्गा पूजा से काफी उम्मीदें थी। लेकिन लगातार दूसरे वर्ष भी पाबंदी लागू होने से उनकी उम्मीदों पर तुषारापात हो गया है।

ठेला-खोमचावालों ने यह कहा

लॉकडाउन में पति की नौकरी चली गई तो किसी प्रकार इडली-ढोसा का ठेला लगा पाई हूं। इस पूजा में किसी मेले में ठेला लगाने के बारे में सोच था, लेकिन इस वर्ष भी सरकार ने मेले पर पाबंदी लगा दी है। कमाई न के बराबर है। अपना पेट काटकर किसी तरह बच्चों का पालन-पोषण कर रही हूं।
अर्चना पांडेय, इडली-डोसा विक्रेता, लालपुर।

प्रति वर्ष पूजा में कहीं न कहीं मेले में गोलगप्पे की दकान लगाते थे। चार-पांच दिन में 14 से 15 हजार की कमाई हो जाती थी। लेकिन, अब कोरोना के कारण आर्थिक संकट पैदा हो गया है। महीने में आठ से नौ हजार तक की कमाई ही हो पाती है। पूजा है, लेकिन अभी तक बच्चों के लिए नए कपड़े भी नहीं खरीद पाए हैं। अरविंद पासवान, गोलगप्पा विक्रेता, कोकर। 

इस शारदीय नवरात्र में लगने वाले मेले से ही कुछ कमाई की उम्मीद थी, लेकिन इस वर्ष भी मेले पर पाबंदी लगा दी गई है। पूजा के दौरान लगने वाले मेले में चार-पांच दिन में 20 हजार तक कमाई हो जाती थी, लेकिन अब और मुसीबत खड़ी हो गई है। तीन बच्चे हैं। पिछले एक साल से स्कूल का फीस भी नहीं जमा कर पाए हैं। चंद्रिका यादव, भेलपुरी विक्रेता, रातू रोड।

पूजा में कुछ अतिरिक्त कमाई हो जाती थी। उम्मीद थी कि इस बार सरकार मेला लगाने की अनुमति अवश्य देगी, लेकिन इस वर्ष भी हम गरीबों की उम्मीदों पर तुषारापात हो गया है। कमाई घटकर आधी से भी कम हो गई है। पूजा में बच्चों के लिए भी कुछ नहीं कर पाया हूं।
गरीबन पासवान, भेलपुरी विक्रेता, कोकर चौक बाजार।

दुर्गा पूजा है, लेकिन खास उत्साह नहीं है। पूजा में मेले के दौरान अच्छी-खासी कमाई हो जाती थी, लेकिन दो साल से मेले पर रोक लगा दी गई है। कमाई भी पहले जैसे नहीं रही। महंगाई भी बढ़ गई है। घर बड़ी मुश्किल से चलता है।
आशीष कुमार, भेलपुरी विक्रेता, कोकर।

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