उमाशंकर अकेला की चौथी पुण्यतिथि पर आज कैलाखाड़ गांव में गरीबों के बीच सामग्री वितरित करेंगे लोग
इंडिया प्राइम न्यूज, लातेहार (झारखंड):वक्त बीतता है, चेहरे बदलते हैं, दौर बदल जाता है। लेकिन कुछ लोग अपनी मेहनत, सादगी और संवेदनाओं से इतिहास के पन्नों में नहीं, लोगों के दिलों में दर्ज हो जाते हैं। चंदवा की धरती पर ऐसा ही एक नाम था उमाशंकर अकेला।
जब फोटो किसी चमत्कार से नहीं था कम :वर्ष 1971 में तत्कालीन पलामू जिला के इस इलाके में कैमरा देखना भी दुर्लभ था। किसान रामजतन साहू के तृतीय पुत्र, वर्ष 1954 में जन्मे उमाशंकर ने ‘अकेला फोटो स्टूडियो’ की स्थापना कर एक नई सोच को जन्म दिया। किसान परिवार में पले-बढ़े इस युवक ने परंपरागत खेती से अलग हटकर सपनों की राह चुनी। उस समय श्याम-श्वेत तस्वीर खिंचवाना किसी उत्सव से कम नहीं होता था। लातेहार समेत दूर-दराज गांवों से लोग ट्रेन पकड़कर चंदवा पहुंचते थे। उनके मन में एक ही विश्वास होता अकेला जी हमारे खास पल को हमेशा के लिए संजो देंगे।

तस्वीर नहीं, भावनाएं कैद करते थे :वरिष्ठ पत्रकार राजेश चंद्र पाण्डेय, जो उनके पहले ग्राहक बने, आज भी यादों में खो जाते हैं। वे कहते हैं कि उमाशंकर जी कैमरा नहीं, दिल से काम करते थे। फोटो खींचते समय वे चेहरे के पीछे छिपी भावना को समझते थे। उनकी तस्वीरों में सिर्फ मुस्कान नहीं, आत्मा झलकती थी। वे बताते हैं कि अखबार के लिए उपलब्ध कराई गई उनकी तस्वीरों ने पत्रकारिता को नई ताकत दी। कई खबरें उनकी फोटो के कारण जीवंत बन पाईं। उन्होंने मेरी पत्रकारिता को सहारा दिया।
संघर्ष से खड़ी की पहचान जो है प्रेरणाप्रद:नरेश प्रसाद गुप्ता के अनुसार लातेहार जिले में फोटो स्टूडियो व्यवसाय को पहचान दिलाने में उमाशंकर अकेला अग्रणी थे। संसाधन सीमित थे, लेकिन उनके इरादे असीमित थे। चंदवा से आगे बढ़ते हुए उन्होंने बालूमाथ, ब्राह्मणी, राय, बचरा, खलारी, तोपा और रामगढ़ तक अपनी मेहनत की पहचान बनाई। उन्होंने कई युवाओं को प्रशिक्षण दिया। आज उनके शिष्य देश के विभिन्न हिस्सों में सफल जीवन जी रहे हैं।
स्टूडियो नहीं, मिलन का केंद्र थी उनकी दुकान :प्रेमशंकर भगत कहते हैं कि अकेला जी की दुकान सिर्फ स्टूडियो नहीं थी, वह लोगों के मिलने-जुलने का स्थान था। वहां हर वर्ग का व्यक्ति बराबरी से बैठता था। भगवानदास गुप्ता याद करते हैं, उनकी सादगी ही उनकी ताकत थी। वे हर ग्राहक को सम्मान देते थे। उनकी मुस्कान लोगों का संकोच दूर कर देती थी।
विरासत सेवा की संकल्प सेवा का :आज उनकी चौथी पुण्यतिथि पर पुत्र मनीष कुमार और रोशन कुमार सुदूर गांव कैलाखाड़ में ग्रामीणों के बीच वस्त्र और जरूरत की सामग्री का वितरण करेंगे। परिवार का कहना है कि यह आयोजन उनके पिता के सेवा-भाव को आगे बढ़ाने का प्रयास है।
तस्वीरें जो कभी धुंधली नहीं होतीं :आज डिजिटल कैमरों और रंगीन तस्वीरों का दौर है। तकनीक बदल गई, लेकिन चंदवा के पुराने एलबम के पन्ने पलटते ही आज भी एक सादगी भरा चेहरा आंखों के सामने आ जाता है। हर फ्रेम मानो कहता है कि तस्वीरें कभी मरती नहीं उनमें जिंदा रहती हैं यादें, रिश्ते और वो रोशनी, जिसने कभी पूरे इलाके को जगमग किया था।






